Book Review – Banaras Talkies (Hindi Novel)

नाम- बनारस टॉकीज

लेख़क- सत्य व्यास

प्रकाशक – हिन्दी युग्म

किताबों की भी अपनी एक दुनिया होती है। और कहा भी गया है की किताबें हमारा सच्चा साथी होती है। ये हमसे बातें करती है, हमें सिखाती है, हमारे अनसुलझे सवालों के जवाब भी देती हा, कभी जीवन के कुछ अनछुए पहलु से भी परिचय कराती है और एक दोस्त की तरह कभी गुदगुदाती है तू कभी रुला भी देती है। ये हमें अपने साथ उस दुनिया में ले जाती है जंहा हमारा मन हमेशा से जाना चाहता है और उस दुनिया में जीना चाहता है।

बैचलर लाइफ हॉस्टल लाइफ भी जीवन की एक ऐसी अनमोल पल है जिसे हमें एक बार जरूर जिन चाहिए। हॉस्टल ना जा सकते तो घर से दूर अकेले दोस्तों के साथ रहने का मज़ा ही कुछ अलग है। और इस दौरान घटी हर घटनाओं से मिल कर हमारी अपनी एक कहानी बनती है। ऐसे ही बनी एक कहानी है ‘बनारस टॉकीज’।

शायद आपको लग रहा होगा की ये भी एक स्टूडेंट लाइफ की कहानी है जंहा तीन चार अजीब टाइप के दोस्त होंगे, कुछ पढ़ाई होगी, मस्ती होगी, नोकझोक, गली-गलौज लड़ाई-झगड़ा और इन सब बीच पनपती एक प्रेमकहानी। जी हाँ आपका अनुमान बिलकुल सही है पर दाद देनी होगी लेखक की जिसने इस कहानी को साधारण से असाधारण बनाया, मजेदार बनाया, अपने कलम से सवारा और क्या खूब लिखा।

यह कहानी है बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी यानि बीएचयू के हॉस्टल – भगवानदास की। कहानी के मुख्य पात्र हैं सूरज ‘बाबा’, अनुराग डे उर्फ़ दादा, जयवर्धन और शिखा। कुछ और हैं जो इन से कम नही है – रोशन, दुबेजी, नवेन्दुजी इत्यादि।

“रूम नंबर -73 में जाइए और जाकर पूछिये की भगवान दास कौन थे? जवाब मिलेगा ‘घंटा’! ये हैं जयवर्धन शर्मा जो बिहार से हैं। लेक्चर, घंटा! लेक्चरर, घंटा! भगवान, घंटा! गलत कहते हैं कहनेवाले की दुनिया किसी त्रिशूल पर टिकी है। यह दरअसल, जयवर्धन शर्मा की ‘घंटे’ पर टिकी है; और वो खुद अपनी कहावतों पर टीके हैं। हर बात पर एक कहावत कहते हैं। उनकी कुछ कहावते, जैसे- ‘गई मांगने पूत को, खो गई भतार!’
‘बुड़बक की यारी और भादो में उजियारी!’
‘खुरपी के वियाह में, सुप का गीत!’
‘आन्हर गुरु बहिर चेला, मांगे गुड़ ता दे दे ढेला!’

ये कहावते खासकर यूपी-बिहार में खूब प्रचलित है। और सत्य व्यासजी ने इनका बिलकुल सही जगह पर उचित अर्थ के साथ उपयोग किया है। इसके अलावे लोकल बोली का भी इस्तेमाल किया गया है जो इस किताब को एक अलग ही रूप देता है। और बनारस का रंग भर देती है।

ये तो थी जयवर्धन की बात। पर सभी दोस्त कुछ इसी तरह के थे। अनुराग डे – क्रिकेट प्रेमी और बातें भी क्रिकेट के स्टाइल में करते हैं! ‘अरे साल, का लेक्चर है जैसे की गार्नर का बाउंसर!’ कुछ इस तरह। इनके रूम पार्टनर हैं – सूरज ‘बाबा’। सूरज को गर्ल्स हॉस्टल में कुछ ज्यादा ही इंटरेस्ट है। इनकी माने तो ABCDEFG का मतलब – A boy can do everything for girl. और Idiot का मतलब – I do ishq only tumse। बहुत कोशिश के बाद इनकी एक गर्लफ्रेंड भी बनती है जिसके नाम है – शिखा।
ये सब लॉ के छात्र है और वकील बनने के सपने लेकर यंहा आते हैं। और फिर शुरू होती इनकी हॉस्टल लाइफ और रैगिंग, पढ़ाई, और मस्ती। और ये सब में दो -ढाई साल कैसे गुज़रता है वो भी बड़ा ही मजेदार है। क्रिकेट, लड़कीबाज़ी, लड़ाई, बाइक की सवारी, गंगाजी की घाटों की सैर, पर्शनपत्र का जुगाड़ और फिर कुछ अच्छे काम। पर इन सब घटनाओं से मिल कर होती है एक बड़ी घटना।

लेखक ने किताब के शुरुआत में ही लिखा है -‘हर घटना के पीछे कोई कारण होता है। संभव है यह घटित होते वक्त आपको न दिखे, लेकिन अंततः जब वह सामने आएगा और आप सन्न रह जायेंगे।’
और कहानी में होता भी कुछ ऐसा ही है जो मुझे सन्न कर गया। पर शायद यही चीज इस कहानी को एक साधारण प्रेम कहानी और कॉलेज के कहानी से अलग बेनाती है।
एक ऐसी घंटे होती है सूरज, अनुराग और जयर्धन के जो हॉस्टल के अलावे पुरे बनारस को हिला कर रख देती है।
वो कैसे इस घटना का समाना करते हैं और क्यों? ऐसा क्या होता है? ये सब तो मैं नही बताऊंगा, क्योंकि फिर आपको इस किताब को पढ़ने में मजा नही आएगा। अतः इस सस्पेंस को जानने के लिए जरूर पढ़े – बनारस टॉकीज।

– शुभम कुमार

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