Book Review – Musafir Cafe (Hindi Novel)

नाम- मुसाफिर कैफे

लेखक – दिव्या प्रकाश दुबे (तीसरी किताब )

कुछ बातें :

मुसाफिर cafe जैसे ही मेरे घर पहुंचा उसकी पहली मुसाफिर थी, मेरी माँ। माँ दो-ढाई घंटे में ही इसे पढ़ कर मुझे बोली , बहुत अच्छी किताब है। मेरी माँ बहुत किताबें पढ़ती हैं पर सबको बहुत अच्छा नहीं बताती है। उन्होंने मुझे इसके बारे कुछ और न बताई। उनकी बातें सुनने के बाद मैं खुद को रोक नहीं पाया और एग्जाम होने के बावजूद भी इसे पढ़ा। और पढ़ने के बाद माइंड एकदम फ्रेश हो गया। मुझे लगा मानो मैंने बहुत कुछ जान लिया हो लाइफ और लव के बारे में।

किताब की बातें :

मुसाफिर cafe में वो सब कुछ है जो किसी अच्छी कहानी या उपन्यास में होना चाहिए। दिव्या ने इसमें थोड़ी मस्ती, थोड़ी हंसी, थोड़ा रोमांस, थोड़ा टेंशन थोड़ी प्रेरणा और सीख भी भर दिया है।इसमें वो लप्रेक वाली खिलखिलाहट लाने वाली गुण भी है और कहानी वाली मज़ा भी है। मुझे लप्रेक पढ़ना बहुत अच्छा लगता है। और इस किताब में जो लप्रेक वाली बातचीत है वो पढ़कर तो मन गदगद हो गया। दिव्या प्रकाश के लेखन की क्या तारीफ करूँ वो तो सब कर ही रहे हैं। कोई-कोई पंक्ति में तो दिव्या प्रकाश ने गज़ब ही लिखा है, या कहें कि शब्दों से जादू किया है। दिव्या प्रकाश की वन लाइनर पढ़ कर दिल दीवाना भी हो जाता है और बेचैन भी। कहीं कहीं कुछ पंक्ति बहुत प्रेरित भी करती है। कई लोग इस किताब को एक ही बार में पढ़ रहे हैं। मैं तो कहता हूँ थोड़ा समय दीजिये और आधा ‘ज’ से ज्यादा मज़ा लीजिये।


‘क’ से कहानी तो कमाल की है हीं। कहानी के पात्र भी बहुत भोले और अच्छे लगते हैं। सुधा, चन्दर, पम्मी और अक्षर में मुझे कोई न कोई नज़र आया। पढ़ते समय लगता है हम उनसे मिल रहे हैं। सुधा जितनी सुलझी हुई है, चन्दर उतना ही उलझा हुआ है। चन्दर जिंदगी  की पहेली को समझ नहीं पाता है और जब समझ आती है तो उसे एक नई जिंदगी और जीने का बहाना भी मिल जाता है। पम्मी को मैं ज्यादा समझ नहीं पाया पर उसने अपनी छाप जरूर छोड़ी है। इस कहानी की मांग थी हैप्पी ending, जो हुआ भी और अच्छा भी लगा। उन सभी को यह किताब पढ़ना चाहिए, जो सच में जिंदगी और प्यार को समझना चाहते हैं। यह किताब हमें बहुत कुछ सिखाती भी और जिंदगी के एक नए मायने से भी रूबरू करती है। 


मैं नई वाली हिंदी का ही एक नया पाठक हूँ। नई वाली हिंदी के इस दौर का शुरुआत शायद दिव्या प्रकाश जी और उनके कुछ दोस्तों ने ही की है।  अगर कहा जाये की यह किताब  नई वाली हिन्दी की एक अच्छी किताब है तो कोई बेईमानी नहीं होगी। लेकिन सुधा और चंनदर को पात्र के रूप में लेना कुछ पाठकों को खल सकता है जो गुनाहों के देवता को पहले पढ चुके हैं। जो भी हो लेकिन दुबेजी ने बढिया लिखा है। धन्यवाद


किताब खरीदने के लिए अमेज़न की ऑनलाइन लिंक:

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