रहस्यमयी ब्रह्माण्ड

​आज मेरे मन में कुछ अजीब विचार तैर रहे थे। उसी को लिखकर आपसब से साझा कर रहा हूँ। कविता कहिए या कुछ भी लेकिन मैं कोई कवि नहीं हूँ।

  • कविता

ब्रह्माण्ड के रहस्यों से अनजान

खुले आसमान के गोद में बैठकर

जब हम अपनी आंखें खोलते हैं

तो सोचने को मजबूर हो जाते हैं

की हम यहाँ क्यों हैं

क्या करने आये हैं

और कर क्या रहे हैं?
फिर मन में एक बात आती है कि

हमें यहाँ किसने भेजा है?

वो भगवान जो सर्वशक्तिमान हैं

उन्होंने इस संसार को बनाकर

हमें यहाँ रहने भेजा हैं!

लेकिन ऐसा क्यों?

या फिर हम स्वयं ही

इस संसार को बनाकर

किसी भगवन को खोज रहे हैं!
पता नहीं क्या सच हैं

पर जो भी हो ये सवाल

हम सभी को परेशान करती है

सबके पास इसका अपना जवाब है

पर क्या सब अपने जवाब से

संतुष्ट हैं!

खुले आसमान में बैठ कर

आज मैं भी यही सोच रहा हूँ

और मैं भी इसी सवाल में उलझा हूँ।

मेरे पास भी एक जवाब है

पर पता नहीं ये जवाब है 

या सिर्फ मेरा भ्रम!
हमसब यहां सिर्फ

जीने-मरने के लिए आये हैं!

इस पृथ्वी नामक

अंतहीन नाटक के

हमलोग अलग-अलग पात्र हैं।

और सब अभिनय

करके वापस चले जायेंगे

जैसे हमारे पूर्वज चले गए।

पर एक बात तो है

जिसने भी इस रहस्मयी

नाटक को लिखना शुरू किया है

लगता है की

वो अमर है

और हमेशा लिखना चाहता

हर विद्वान लेखक की तरह।

– शुभम्

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2 thoughts on “रहस्यमयी ब्रह्माण्ड

  1. बेहतरीन पंक्तियाँ हैं भई! ऐसा अहसास हो रहा था कि अटल जी कविता पढ़ रहा हूँ , आप अच्छा लिखते हैं , यह क्रम जारी रखिएगा।

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