नमक स्वादानुसार (Book Review)

​’मौत बेशक़ जिंदगी से कहीं ज्यादा हसीन होती है। कभी टोपाज के ब्लेड को अपनी कलाई पर रख कर देखना। ऐसा लगता है जैसे शीरी से मिलने फ़रहाद आ गया हो।’ – निखिल सचान

निखिल सचान दिल खोल के लिखने वाले इंसान हैं। नमक स्वादानुसार इनकी पहली किताब है। यह एक कहानी संग्रह है। इसके बाद इनकी दूसरी किताब जिंदगी आइस पाइस आयी, वह भी एक कहानी संग्रह है। कुल मिलाकर निखिल सचान कहानी लिखने में माहिर है और अभी उनकी एक उपन्यास भी आने वाली है। अभी बात नमक स्वादानुसार की करते हैं। लेखक का कहना है कि इस किताब की कहानियाँ जहन में उसी तरह आई हैं, जिस तरह देह को बुख़ार आता है। ये बात सही भी लगती है क्योंकि सभी कहानियाँ पूरी तरह अलग है जो मेरे जैसे पाठकों को पहली बार पढ़ने को मिलेगी। यह किताब मेरे पास पिछले आयी थी। और मैं इसे दो बार पढ़ चुका हूँ।

 शुरुआत की दो कहानियाँ मुझे बहुत मजेदार लगी। ‘परवाज़’ और ‘हीरो’ के बाद तीसरी कहानी है ‘मुग़ालते’। यह शायद इस किताब की और निखिल सचान द्वारा लिखी गई सबसे प्रसिद्ध कहानियों में से एक है। जब मैंने इसे पहली बार पढ़ा तो मुझे अच्छा तो लगा लेकिन थोड़ा अजीब भी लगा क्योंकि ऐसी कहानी मैंने पहली बार पढ़ी थी। यह एक कोठे की कहानी है जिसे लेखक ने बड़े शानदार तरीके से प्रस्तुत किया है। शब्दों के चयन पर मेरे मन में बहुत सवाल आये लेकिन ‘काशी के अस्सी’ जैसे किताबों को पढ़ने के बाद कुछ अश्लील शब्द भी प्रयोग में उचित लगे। इसके बाद कि कहानी है – पीली पेंसिल, जो बचपन के दर्द और असमंजस को बहुत सुंदर ढंग से कहती है। फिर अगली कहानी है – ‘टोपाज’। इसमें सबसे ज्यादा बिकने वाले एक लेखक के मन की बात लिखी गई है जो एक अलग अनुभव देती है। लेखक ने इस कहानी के बहाने बहुत सारी बातें कही है जो आज के संदर्भ में बिल्कुल सही है। छठी कहानी है -‘सुहागरात’। यह आज के प्रेम और संबंध की कहानी कहती है तो अगली कहानी ‘विद्रोह’ आज से सौ साल पहले की प्रेम कहानियों की बात बताती है। और लेखक ने बड़े गज़ब तरीके से इन कहानियों को लिखा है। ‘विद्रोह’ कहानी मुझे बहुत अच्छी लगी। ‘साफे वाला साफा लाया’ कहानी आज के धार्मिक भेदभाव और नेताओं द्वारा धर्म के आधार पर भड़काई गई लड़ाई पर बेजोड़ प्रहार करती है। और निखिल सचान की कहानी गढ़ने की ढंग इसे एक बेहतरीन कहानी बना देती है।

 निखिल बात-बात में ही बहुत गहरी बात कह देते हैं। ‘बाजरे का रोटला’ एक गाँव के दो बच्चों की कहानी मात्र लगती है लेकिन यह गरीबी की एक मार्मिक चित्रण है। लेखक ने कहानी को बच्चों की भाषा में और देहाती तरीके से लिखी है। जो ऐसी किताब पहली बार पढ़ रहे हैं उनको ये भाषा थोड़ा अजीब लग सकती है पर ऐसी भाषा शायद इन कहानियों की मांग है। पर कहीं कहीं लगता है कि कुछ चीजें जबरदस्ती डाली गई है। ऐसा प्रतीत होता है कि गाली वाले शब्द कई जगह बिना जरूरत के प्रयोग किया गया है। कुल मिलकर सभी कहानियाँ अच्छी है और पढ़ने लायक है। निखिल सचान के पास कहानियों को कहने का अपना अलग ही अंदाज़ है। 

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